मेरी जापान यात्रा: कड़ी 2: बस के अन्दर भस‍‍‍ड़

पिछली कड़ी में मैं जापान की धरती पे पधार गया था. और नारिता हवाई अड्डे पे अपने वियतनाम से आये मित्रों से भेंट हुई. उन्होंने लाल रंग के टी शर्ट के बीच पीले रंग के चमचमाते तारा वाले पोशाक को पहने हुए थे. (वियतनाम का राष्ट्रीय ध्वज़) इसी बीच पंकज जी ने जापानी भाषा में अपना परिचय एक वियतनामी बहन को देने की कोशिश की. लेकिन शायद बहन जी को पंकज जी की भाषा नहीं बूझी थी. और पंकज जी का सार्थक प्रयास इन बहन जी पर निरर्थक हो गया.
चलिए फिर हमने कूच किया बस की तरफ़. वियतनाम के भईया और बहेने शान्ति का परिचय देते हुए बस के आगे की गद्दियों में अपनी तशरीफ़ जमा ली और ज्यादतर लोग निद्रामग्न हो गये. किन्तु हम भारत से आये 10 लोगों का जत्था परम उत्साहित था. बस के सबसे पिछली गद्दियों में अपने को जमाया और खिडकियों से जापान का नज़ारा लिया जाने लगा. और हाँ! हमने पहली बार बस की गद्दियों में भी सीट बेल्ट का अस्तित्व पाया. हमारे को लेने आयी मैडम जी ने पहले से ही इत्तला किया की कृपया अपनी सीट बेल्ट बांध लें. लेकिन ऐसा करना हम लोगों को मंजूर नहीं था. क्योंकि जापान पहुंचने की उत्साह हमें बस की गद्दियों पे रुकने नहीं दे रही थी. एक गद्दी से दूसरी गद्दी पे फुदकना जारी था. खिड़कियों के बाहर का नज़ारा लिया जा रहा था. चौड़ी चौड़ी सड़कें, चमचमाती कारें, भिन्न भिन्न प्रकार की इमारतें और मोबाइल तथा कैमरों से इन पलों को कैद करने में व्यस्त  हमारी अँगुलियाँ। साथ ही साथ दोस्तों के साथ तफरीह भी जारी थी जिसकी छोटी सी झलक नीचे के चलचित्र में देख सकते हैं.
बस में जिओ के नेटवर्क के बारे में चर्चा!
 हमने रास्ते में डिज़्नी लैंड की झलक भी देखी. पुलों से जब बस गुजरती थी तो किनारों की जालियों के कारण फोटो लेने का मज़ा किरकिरा हो जाता था. इन्हीं मस्ती और तफरीह के साथ बस पहुंची अपने पहले पड़ाव पे जोकि था जोज़ो मंदिर ठीक तोक्यो टावर के पीछे. 

जारी... 
शेष मस्ती फिर कभी..  

Comments

  1. भाई बहुत बढ़िया। मैंने आपकी पोस्ट " मेरी जापान यात्रा" की दोनो कड़ी पढ़ी। मजा आ गया।

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    1. शुक्रिया ! आपकी ये तारीफ़ दवा जैसी काम करती है. ये यात्रा के हालांकि अब ३ वर्ष होने को हैं और मुझे अपने लेखन के लिये वाजिब प्रेरणा तथा समय नहीं मिल पाता है जिसके लिए मैं क्षमा मांगता हूँ.

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