मेरी जापान यात्रा: कड़ी 1: मेरी पहली हवाई यात्रा

 जापान, एक खुबसूरत, सुन्दर देश है. ये मेरी पहली जापान यात्रा थी. और ये पहली छाप जापान की. जापानी भाषा से जापान और जापानी संस्कृति को और करीब से जानने की इच्छा बढ़ती ही जा रही थी जोकि जापान जाने की जरुरत को बयां कर रही थी. हालांकि इस मौके को भुनाने में चार साल लग गये. और मुझे आखिरकार JENESYS2016 प्रोग्राम द्वारा जापान जाने का मौका मिला. ये प्रोग्राम 8नवम्बर से 15नवम्बर तक का था. हालांकि 7 दिनों के इतने कम समय में जो कुछ किया, वह हमेशा सीखने लायक और याद रहेगा. इस यादगार सफर में भारत से शान्ति दूत की पहली खेप में 10 लोग थे. जिसमें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पांच लोग और दिल्ली विश्वविद्यालय से पांच थे.  चूंकि ये शान्ति यात्रा थी इसलिये हमारा हिरोशिमा या नागासाकी जाना लाजिमी था. मैंने हिरोशिमा जाने के सपने देखना शुरू कर दिया था. लेकिन नसीब ने मुझे नागासाकी पहुंचा दिया. एक माह पूर्व ही हमें इसकी जानकारी मिली और एक माह से न जाने कितनी तैयारियां होने लगी थी. सपनों में जापान, जागते हुए भी जापान. जापान जापान और बस जापान. सारे दूसरे कामों को तिलांजलि देकर बस सपनों के जहाज़ में दिन रात जापान ही नज़र आने लगा था. आज मैं जापान के बारे में अपने नज़रिये से नज़ारों और घटनाओं की चर्चा करना चाहूँगा. हालांकि इस लेख को लिखने की शुरुआत आज हो रही है जिस कारण समय की चादर में कुछ बातें ढक जायें लेकिन जेहन में अभी भी यादें ताज़ा हैं और हमेशा रहेंगी. तो चलिये मेरे साथ जापान की शानदार यात्रा में एक साथ...

ख़ुशी ऐसी थी कि पच ही नहीं रही थी. वालिया जी और मयंक जी के साथ इंदिरा गाँधी हवाई अड्डे पर स्वयं खीचूं फोटो

                                             कड़ी 1: मेरी पहली हवाई यात्रा
 तो समय आ गया था. 7नवम्बर, 2016. मेरी पहली जहाज़ यात्रा. काफी उत्साहित था इस यात्रा के लिये. समन्दर पार दूसरी धरती पे जाना अपने आप में एक ख़ास बात होती है. हम बस ये टेलीविज़न, समाचार इत्यादि में ही देखते थे . लेकिन स्वयं जाकर उस धरती पर अनुभव करना, स्वयं की सोच में बदलाव को जन्म देना होता है. और मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. तो समय शाम को सात बजे की उड़ान और इसी बीच इंदिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विचरण करने का भी मौका मिल गया. बहुत ही खूबसूरत है यह हवाईअड्डा. समय आ गया और हमने जापानी एयरलाइन “जाल” पे चढाई कर दी. इतना बड़ा जहाज़ मैंने पहली बार देखा. अंदर प्रवेश करते ही सीट नंबर की तलाश करने लगा. अ! पता चला कि मैं तो बिज़नेस क्लास में अपनी औकात देख रहा हूँ. फिर प्रीमियम इकोनोमिक क्लास और फिर आई इकोनोमिक क्लास. अपनी गद्दी नसीब तो हुयी लेकिन शोर मचाते हुए इंजन के करीब.  जहाज़ के मेहमानों की खातिरदारी में लगी हुई युवतियाँ बड़ी ही चौकसी और हल्की ही मुस्कराहट के साथ अपने काम को अंजाम दे रही थीं. और समय आ गया. जहाज़ ने दम भर दिया. और स्वयं के शरीर ने भी. उत्साह के इस समय में चालक ने बड़े ही समझदारी से उड़ान भरा कि पता ही नहीं चला कि मैं कब आसमानों से बातें करने लगा था. खिड़की के पास वाली गद्दी पे विराजमान मेरे मित्र बहार का नज़ारा ले रहे थे. सौभाग्यवश मैं उनके बगल में बैठा था. मुझे भी आसमान से नीचे नज़र आती खूबसूरत धरती का नज़ारा मिला. अरे वाह~! मेरे सामने तो स्क्रीन लगी हुई है. अरे इसमें तो आप उड़ते उड़ते कहाँ जा रहे हैं उसकी भी जानकारी है. चलचित्र, संगीत भी इसमें समावेशित हैं. अब तो यात्रा बेहद सुकून भरी होगी. मज़ा आ गया~! अरे~! एक सेविका हमारे पास अचानक ही आ गयीं? क्यूँ? पता चला कि हमने गलत बटन दबा दिया था. अरे~! ये भी सुविधा है! मैं खुद से बोल रहा था. सेविका ने अब सबकी सेवा में तत्परता दिखायी और पेश कर दिया हमारे सामने भोजन. बीच आसमान में खाने का पहला तजुर्बा. मैंने भाव में आकर उन्हें “अरिगातो~!” बोला तो उस सेविका ने मेरे भारतीय होने पर ही प्रश्न कर दिया. हालांकि ये तो मेरे लिये आम प्रश्न था. फिर भी एक जापानी मोहतरमा द्वारा ऐसा पूछा जाना मुझे चौंका दिया. फिलहाल खाना बड़ा ही स्वादिष्ट था लेकिन पेट और मन नहीं भरा.  समय हो चला था मेरी घड़ी की हिसाब से 11. लेकिन नींद आ ही नहीं रही थी. जैसा कि आप जानते होंगे कि भारत और जापान के बीच में साढ़े तीन घंटे का फर्क है. मुश्किल से 2घंटे की झपकी ही ली थी कि हवाई जहाज़ की सेविका महोदया ने हमारे सामने सबेरे का नाश्ता पेश कर दिया था. अरे अरे ! अभी तो 2 ही बज रहे थे घड़ी में. बोले तो जापानी समय के हिसाब से 5:30. फिलहाल बाहर देखा तो खूबसूरत नज़ारा था. बादलों के रुइयों पर सूरज की रौशनी. वाह! मानों कि कोई दूसरी दुनिया हो. फिर कहाँ नींद आनी थी ज़नाब. सुबह हो चुकी थी और हमारी यात्रा मंजिल के करीब पहुँचने वाली थी. हवाई जहाज के छोटे से शौचालय में जाने के लिये पंक्तियाँ लगने लगी थीं. हमें भी भारत में पिये गये पानी को जापान के आसमान में निष्कासित करने का सम्मान मिला. हवाई जहाज़ के शौचालय के प्रथम दर्शन ने हमें अचंभित कर दिया. फ्लश बदन का जोरदार और अचानक किये गये आवाज़ ने हमारी सारी शंकाओं को दूर कर दिया. बहुत बहुत धन्यवाद!  
आसमान के बीच में नाश्ते का अनुभव 
मंजिल की ओर

मखमली रुई 
 हवाई जहाज़ के चालक महोदय ने सूचना दी कि सारे यात्री स्वयं को अपनी सीट से बाँध लें. जहाज़ तोक्यो के नरीता हवाई स्थल पर उतरने वाली है. तो फिर क्या था; हमने स्वयं को गद्दी से कस कर बाँध लिया. चालक महोदय ने बड़ी ही कुशलता के साथ हमें सुरक्षित जापान की धरती पर पहुंचा दिया था. नरीता हवाईस्थल दिल्ली के हवाईस्थल जैसा तो नहीं है. लेकिन जापान पहुँच जाने का आभास अवश्य करा रहा था. और जैसे ही हम आगमन द्वार को पार किये हमारे स्वागत में एक जापानी महिला इंतज़ार कर रही थीं. चलो जापान के “ओमोतेनाशी!” का अनुभव लेने का समय आ गया है इसी खयालात में हमने मुस्कुराते हुये उनके गर्मजोशी के “कोनीचिवा” को ग्रहण किया. संदर्भ के लिये आपको बता देते हैं कि “ओमोतेनाशी!” का अर्थ “ख़ातिरदारी” से है. भारत के “अतिथि देवो भाव:!” से मिलती जुलती भावना “ओमोतेनाशी!” कहलाती है. “कोनीचिवा” का अर्थ “नमस्ते” होता है. 
नमस्ते जापान 
 जापान पहुँचते ही 6डिग्री के तापमान ने हमें शौचालय जाने को मजबूर कर दिया. जापानी धरती पर पहली लघुशंका का अनुभव; वो भी नरीता हवाईअड्डे के सुलभ शौचालय में; बेहद ही अलग था. जैसे ही सुलभ शौचालय पहुंचा तो वहां दो सफाई कर्मचारी सफाई में व्यस्त थे. दोनों सफाईकर्मी महिलायें थीं. पुरुष शौचालय में महिला? इस अचम्भे के साथ काफी शर्माते हुये हमने अपनी शंका का निष्पादन किया. फिलहाल कार्य तो कार्य होता है. और कोई भी कार्य अगर पूरे कर्तव्य के साथ निभाया जा रहा हो तो उसे करने वाला व्यक्ति महिला हो या पुरुष; इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता है. 
  
जापान की धरती पर जापानी पेयजल की पहली बोतल को प्यार देते हुये विशाल जी.

 हवाईअड्डे पर दूसरी चीज़ अचंभित करने वाली थी “टेलीफोन बूथ” मतलब “पी.सी.ओ.”. मोबाइल के इस दुनिया में “पी.सी.ओ.” का होना सच में अचम्भित करने वाली बात है. भारत में “पी.सी.ओ.” तो अब मुश्किल से ही नज़र आते हैं. अगर कभी बहुत ही जरुरी समय में जब आपका मोबाइल डब्बा मात्र हो जाये और आपको किसी अपने से बात करनी हो तो ऐसी विकट स्थिति में शायद ही कोई आपको अपना मोबाइल उधार दे बात करने के लिये. और आप “पी.सी.ओ.” ढूढ़ते ढूढ़ते परेशान हो जायेंगे. लेकिन जापान में ऐसा नहीं है. विकसित टेक्नोलॉजी से लैस विकसित जापान में अभी भी “पी.सी.ओ.” का अस्तित्व है. और ये जापान की “नये और पुराने के बीच सामंजस्यता” वाली विशेषता को दिखाती है. सच में जापान “() वा” के अर्थ को सार्थक कर रहा है. () का अर्थ “सामंजस्य” भी होता है. तो फिर देर किस बात की थी मैंने तत्काल ही 1000येन का टेलीफोन कार्ड खरीदा और पिता जी को फ़ोन लगा दिया. अब जाकर महसूस हो रहा था कि मैं जापान पहुँच गया हूँ क्यूंकि इन्टरनेट के इस समय में अंतर्राष्ट्रीय फोन लगाना थोड़ा अजीब सा लगता है लेकिन वो अनुभव सच में बहुत ही ख़ास था.
टेलीफोन कार्ड

 अब बस आ गयी थी और हम सब नरीता हवाईअड्डे से बाहर जा रहे थे. तो ये थी मेरी दिल्ली से तोक्यो के पहले सफर की पहली कड़ी. दूसरी कड़ी के लिये कीजिये इंतज़ार.  धन्यवाद!        ....शेष फिर  




Comments

  1. Congratulations adi for your first writing...
    A really interesting piece of description.... specially the लघुशंका part...keep it up bro..

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    1. प्रशंसा के लिये शुक्रिया. मेरे ब्लॉग को पढ़ने के लिये आभार! :)

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  2. अति उत्तम भइया जी,
    मजा आ गया।अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा������

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    1. धन्यवाद! अगली कड़ी को भी पेश किया जायेगा. :)

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